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- Traditional farming | बीज उपचार से लेकर मिट्टी की उर्वरता बढ़ाने, कीट प्रबंधन और खेत में नमी बचाने तक कई ऐसी विधियां हैं, जिन्हें किसान पीढ़ियों से अपनाते आए हैं।
- यह भी पढ़िए..रबी फसलों बुवाई करते समय किसान इन बातों का रखें ध्यान बढ़ेगी पैदावार, देखें पूरी जानकारी..
- मटका खाद : मिट्टी के घड़े में 5 किलो गोबर, गाय का 5 लीटर मूत्र, 5 लीटर पानी, 250 ग्राम गुड़ मिलाकर घोलें।
- इस घोल में 200 लीटर पानी मिलाकर 1 एकड़ खेत में समान रूप से छिड़कें, 7 दिन फिर छिड़काव करें।
किसान अपने खेतों में पारंपरिक खेती कर के बड़ा सकता है पैदावार, तो आईए जानते हैं इस खबर (Traditional farming) के माध्यम से…
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Traditional farming | बीज उपचार से लेकर मिट्टी की उर्वरता बढ़ाने, कीट प्रबंधन और खेत में नमी बचाने तक कई ऐसी विधियां हैं, जिन्हें किसान पीढ़ियों से अपनाते आए हैं। इनमें गोबर, गोमूत्र, नीम की पत्तियां, फसल अवशेष, देशी बीज और वर्षा जल संचयन जैसी विधियां खेती में बाहरी साधनों पर निर्भरता घटा सकती हैं।
पंचगव्य, जीवामृत, बीजामृत, नीमास्त्र, जोहड़, ग्रीष्म जुताई जैसी विधियां कम लागत में 20-30% अधिक उत्पादन दे सकती हैं। ये जलवायु परिवर्तन के दौर में आत्मनिर्भर बनाती हैं। हालांकि इन विधियों को अपनाते समय फसल, मिट्टी, मौसम और स्थानीय परिस्थितियों का ध्यान रखना जरूरी है।
पारंपरिक खेती Traditional farming करके किसान लाखों का फायदा कर हैं, तो आईए जानते हैं इस खबर के माध्यम से किन तरीको को अपना कर अपने खेतों में उत्पादन बढ़ा सकते हैं जानिए पूरी डटेल..
बेहतर अंकुरण के लिए अपनाएं यह विधियां
बीजामृत ; गाय के 5 किलो गोबर को कपड़े में बांधकर गांठ बनाएं। 20 लीटर पानी में लटकाकर 12 घंटे तक डुबोकर रखें। इसमें 100-150 ग्राम खेत के मेड़ की मिट्टी डालकर हिलाएं। घोल में 5 लीटर गौमूत्र, फिर चूना पानी मिलाकर हिलाएं। बुवाई से 24 घंटे पहले बीजों को फैलाकर इस बीजामृत का छिड़काव करें। Traditional farming
नीम : ताजा पत्तियों को रातभर पानी में भिगोकर बीजों को 12-18 घंटे डुबोएं। इससे फफूंद जनित रोग नहीं लगेंगे, अंकुरण 20-30% बढ़ सकेगा। यह धान, गेहूं, सब्जियों के लिए उपयुक्त।
लाल मिट्टी लेप : सूखी लाल मिट्टी को पानी में घोलकर लेप बनाएं। बीजों पर पतली परत चढ़ाकर छाया में सुखाएं। यह चने-मटर के बीजों में मुफीद है। चूहों से बचाता है। Traditional farming
जड़ों के लिए : 50 ग्राम अजवाइन को 5 ली. पानी में उबालकर ठंडे घोल में बीज को 8-10 घंटे भिगोएं। यह जड़ गलन रोग से बचाएगा।
गाय का मूत्र 10 गुना पानी में घोलकर बीज 30 मिनट भिगोएं। यह आलू के बीजों में प्रभावी। Traditional farming
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मिट्टी के पोषण के लिए मटका खाद अच्छी
जीवामृत : देशी गाय का 10 किलो गोवर, 5 लीटर गोमूत्र, 2 किलो गुड़ 200 लीटर पानी में मिला। 2 किलो बेसन, 500 ग्राम वटवृक्ष के नीचे की मिट्टी डालकर 10 मिनट हिलाएं। कपड़े से ड्रम को बंद कर दें। सुबह-शाम घोल को 15 मिनट हिलाएं। 48 घंटे बाद जीवामृत तैयार। फसलों पर जीवामृत के 10% घोल का छिड़काव करें। Traditional farming
मटका खाद : मिट्टी के घड़े में 5 किलो गोबर, गाय का 5 लीटर मूत्र, 5 लीटर पानी, 250 ग्राम गुड़ मिलाकर घोलें। घड़े का मुंह कपड़े से बांधकर 10 दिन के लिए मिट्टी में गाड़ दें। इस घोल में 200 लीटर पानी मिलाकर 1 एकड़ खेत में समान रूप से छिड़कें, 7 दिन फिर छिड़काव करें।
भूतअमृत पानी : गाय के 10 किलो ताजा गोबर में 500 ग्राम शहद मिलाकर फेंटें। गाय का 250 ग्राम घी डालकर मिलाएं। ताजा मिश्रण ही काम में लें। एक किलो मिश्रण को पतला कर बीज पर छिड़कें। बीज को छाया में सुखाकर बोएं। बुवाई से पूर्व एक एकड़ खेत में 10 किलो मिश्रण को 200 लीटर पानी में घोलकर अपने खेतों में छिड़काव कर सकते हैं। Traditional farming
कीटों और रोगों बचाव के उपाय
नीम की पत्तियों, फूलों व बीजों को पानी में उबालकर छिड़कें। तना बेधक, चूसक कीट नियंत्रित होंगे। Traditional farming
तीखा सत : 500 ग्राम हरी तीखी मिर्च, 500 ग्राम लहसुन, 1 किलो धतूरा पत्ती तथा 500 ग्राम नीम पत्ती को 10 लीटर गोमूत्र में मिलाएं। आधा रहने तक उबालें। 7-10 दिन तक छायादार स्थान पर सड़ाएं। सत निचोड़कर छानें, भंडारित करें। 5% का घोल तैयार कर खेत में छिड़काव कर सकते हैं।
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विशाल चौधरी Pravah Times के Editor हैं। वे कृषि और खेती-किसानी से जुड़ी खबरों व उपयोगी जानकारी पर विशेष रूप से काम करते हैं। उनका उद्देश्य किसानों तक सरल भाषा में खेती, फसल और कृषि से जुड़ी महत्वपूर्ण जानकारी पहुंचाना है।

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